संदेश

संस्कार

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                 जिस क्रिया से शरीर, मन और आत्मा उत्तम हो उसको संस्कार कहते हैं। संस्कार किसी वस्तु के पुराने स्वरूप को बदलकर उसे नया स्वरूप दे देता है। जैसे सुनार अशुद्ध सोने को अग्नि में तपाकर उसे शुद्ध बना देता है, वैसे ही वैदिक संस्कृति में उत्पन्न होने वाले बालक को संस्कारों की भट्टी में डालकर उसके दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुणों को डालने का प्रयास किया जाता है, इसी प्रयत्न को संस्कार कहते हैं।           चरक ऋषि ने कहा है - 'संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते' अर्थात् पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उनकी जगह  सद्गुणों का आधान करने को संस्कार कहते है। बालक का जब जन्म होता है तब वह दो प्रकार के संस्कार अपने साथ लेकर आता है, एक प्रकार के संस्कार वे हैं, जिन्हें वह जन्म-जन्मांतरों से अपने साथ लाता है, दूसरे प्रकार के संस्कार वे हैं, जिन्हें वह अपने माता-पिता के संस्कारों के रूप में वंश परम्परा से प्राप्त करता है। ये अच्छे भी हो सकते हैं, बुरे भी हो सकते हैं। संस्कारों द्वारा मानव के नव निर...

आयुष्काम यज्ञ

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आज के समय में बहुत से लोग 50 वर्ष के आयु के पश्चात दीर्घरोगी हो जाते है । ऐसी अवस्था में उसके परिवार के लोग *निरोगता और दीर्घायु* की कामना से जो यज्ञ कराते  हैं । उसे *आयुष्काम यज्ञ* कहते हैं । इस यज्ञ में शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए ईश्वर से प्रार्थना किया जाता है। नीरोगता और दीर्घायुष्य की कामना से यह यज्ञ होता है । यह यज्ञ वृद्ध लोग के जन्म दिन पर अथवा बिमार होने की अवस्था मे किया जाता है । 

सफलता और असफलता की पहचान क्या है

   "सफलता और असफलता की पहचान क्या है? 'हृदय से सम्मान मिलना,' सफलता की पहचान है। और 'दिखावे का सम्मान मिलना,' असफलता की।"        प्रतिदिन लोग एक दूसरे से मिलते हैं। परस्पर व्यवहार करते हैं। नमस्ते स्वागत सम्मान आदि करते हैं। "एक दूसरे को उपहार/ गिफ्ट आदि देकर भी अनेक प्रकार से सम्मानित करते हैं, और एक दूसरे को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं।"            यह जो एक दूसरे को सम्मान दिया जाता है। यह सम्मान दो प्रकार का होता है। एक तो - "वास्तविक (असली) सम्मान अर्थात निर्भय होकर श्रद्धा पूर्वक हृदय से किया गया सम्मान।" और दूसरा - "सिर्फ दिखावे का सम्मान, या नकली सम्मान।"           "वास्तविक सम्मान में, सम्मान कर्ता के हृदय में, सम्माननीय व्यक्ति के प्रति श्रद्धा होती है, प्रेम होता है, समर्पण होता है, सद्भावना होती है, विश्वास होता है। उसके चेहरे पर वास्तविक प्रसन्नता होती है।" "नकली सम्मान में अर्थात जो सम्मान करने का दिखावा किया जाता है उसमें, हृदय में कोई प्रेम, श्रद्धा, सद्भावना, समर्पण, विश्वास आदि...

गृह शुद्धि यज्ञ

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गृह-शुद्धि  -- यज्ञ  घर की शुद्धि के प्रयोजन से जो यज्ञ किया जाता है, उसे ''गृह-शुद्धि यज्ञ'' नाम दिया गया है।  इस प्रकार का यज्ञ प्रायः प्रसव के पश्चात्, देहांत के पश्चात्, व्याधि मुक्ति अथवा व्याधि काल में, व्याधि प्रसार के समय रोगाणु  विनाश के लिए अथवा अन्य किसी ऐसे ही विशेष अवसर पर किया जाता है। आचार्य श्री प्रेम कुमार आर्य  सम्पर्क-- 9304366018

पुंसवन संस्कार

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  हिन्दू धर्म संस्कारों में पुंसवन संस्कार द्वितीय संस्कार है। जीव जब पिता के द्वारा मातृगर्भ में आता है, तभी से उसका शारीरिक विकास होना प्रारम्भ हो जाता है। बालक के शारीरिक विकास अनुकूलतापूर्वक हों, इसीलिए यह संस्कार किया जाता है। शास्त्र में कहा गया है कि गर्भाधान से तीसरे महीने में पुंसवन-संस्कार किया जाता है। इस संस्कार से गर्भ में आया हुआ जीव पुरुष बनता है। कहा भी है कि जिस कर्म से वह गर्भस्थ जीव पुरुष बनता है, वही पुंसवन-संस्कार है। वैद्यक शास्त्र के अनुसार चार महीने तक गर्भ का लिंग-भेद नहीं होता है। इसलिए लड़का या लड़की के चिह्न की उत्पत्ति से पूर्व ही इस संस्कार को किया जाता है। इस संस्कार में औषधिविशेष को गर्भवती स्त्री की नासिका के छिद्र से भीतर पहुँचाया जाता है। सुश्रुतसंहिता  के अनुसार जिस समय स्त्री ने गर्भधारण कर रखा हो, उन्हीं दिनों में लक्ष्मणा, वटशुंगा, सहदेवी और विश्वदेवा — इनमें से किसी एक औषधी को गोदुग्ध के साथ खूब महीन पीसकर उसकी तीन या चार बूँदें उस स्त्री की दाहिनी नासिका के छिद्र में डालें। इससे उसे पुत्र की प्राप्ति होगी। पुंसवन-संस्कार गर्भस्थापन के त...

भारतीय संस्कृति के अनुसार कैसे मनाएं जन्मदिन

भारतीय संस्कृति के अनुसार कैसे मनाएं जन्मदिन :-   प्रेम कुमार आर्य 9304366018 आजकल प्रायः देखने में आता है की लोग आधुनिकता और पश्चिमी सभ्यता में इतने खो गए की उन्हें यह पता ही नही की क्या ग़लत है और क्या सही.पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में हम अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं मनोबल को इतना अधिक गिरा चुके हैं की उन्हें उठने में न जाने कितने युग बीत जायें कहा नहीं जा सकता। प्रायः जन्मदिन बड़े ख़ुशी से मानते है खैर मनाना भी चाहिए लेकिन मोमबत्ती जलाकर उसे फूंक मार कर बुझा देते है,केक को काट कर खिलाते है , उस रात्रि में जागरण के बदले प्रायः लोग मौज-मस्ती के साथ शराब और तामसिक भोजन करते है ये कहाँ का नियम है , इसलिए भारतीय पद्धति से जन्मदिन मनाये और अपने प्रियजनों को दीर्घायु बनाये ..हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए की विधाता ने जितनी आयु निर्धारित कर रखी है , धीरे -धीरे उसकी अवधि समाप्त हो रही है , इसलिए अपने धर्म का पालन और उसकी रक्षा करे क्या करे जन्मदिन वाली तिथि पर ध्यान देने योग्य बाते :- 1. जन्मदिन दिनांक के आधार पर मानते है तिथि के अनुसार नहीं, तिथि अनुसार जन्मदिन मनाने से उस दिन हमा...

गर्भाधान संस्कार

गर्भाधान संस्कार   हिन्दू   धर्म   संस्कारों   में   गर्भाधान — संस्कार   प्रथम   संस्कार   है।   यहीं   से   बालक   का   निर्माण   होता   है।   गृहस्थाश्रम   में   प्रवेश   करने   के   पश्चात्   दम्पति - युगल   को   पुत्र   उत्पन्न   करने   के   लिए   मान्यता   दी   गयी   है।   इसलिये   शास्त्र   में   कहा   गया   है   कि  -  उत्तम   संतान   प्राप्त   करने   के   लिए   सबसे   पहले   गर्भाधान - संस्कार   करना   होता   है।   पितृ - ऋण   उऋण   होने   के   लिए   ही   संतान - उत्पादनार्थ   यह   संस्कार   किया   जाता   है।   इस   संस्कार   से   बीज   तथा   गर्भ   से   सम्बन्धित   मलिनता   आदि   दोष   दूर ...