जिस क्रिया से शरीर, मन और आत्मा उत्तम हो उसको संस्कार कहते हैं। संस्कार किसी वस्तु के पुराने स्वरूप को बदलकर उसे नया स्वरूप दे देता है। जैसे सुनार अशुद्ध सोने को अग्नि में तपाकर उसे शुद्ध बना देता है, वैसे ही वैदिक संस्कृति में उत्पन्न होने वाले बालक को संस्कारों की भट्टी में डालकर उसके दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुणों को डालने का प्रयास किया जाता है, इसी प्रयत्न को संस्कार कहते हैं। चरक ऋषि ने कहा है - 'संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते' अर्थात् पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उनकी जगह सद्गुणों का आधान करने को संस्कार कहते है। बालक का जब जन्म होता है तब वह दो प्रकार के संस्कार अपने साथ लेकर आता है, एक प्रकार के संस्कार वे हैं, जिन्हें वह जन्म-जन्मांतरों से अपने साथ लाता है, दूसरे प्रकार के संस्कार वे हैं, जिन्हें वह अपने माता-पिता के संस्कारों के रूप में वंश परम्परा से प्राप्त करता है। ये अच्छे भी हो सकते हैं, बुरे भी हो सकते हैं। संस्कारों द्वारा मानव के नव निर...
संस्कार शब्द का मूल अर्थ है, "शुद्धिकरण " | मूलतः संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों से था जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का पूर्ण रूप से योग्य सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके शरीर, मन और मस्तिष्क को पवित्र करने के लिए किए जाते थे, किन्तु हिन्दू संस्कारों का उद्देश्य व्यक्ति में अभीष्ट गुणों को जन्म देना भी था | प्राचीन भारत में संस्कारों का मनुष्य के जीवन में विशेष महत्त्व था | संस्कारों के द्वारा मनुष्य अपनी सहज प्रवृतियों का पूर्ण विकास करके अपना और समाज दोनों का कल्याण करता था | ये संस्कार इस जीवन में ही मनुष्य को पवित्र नहीं करते थे, उसके पारलौकिक जीवन को भी पवित्र बनाते थे | हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों ( षोडश संस्कार ) का उल्लेख किया जाता है जो मानव को उसके गर्भाधान संस्कार से लेकर अंत्येष्टि क्रिया तक किए जाते हैं | आर्य समाज के योग्य पंडित, ब्राह्मण और विद्वानों से संस्कार करवाने हेतु हमारे हेल्पलाइन पर कॉल करें | यहाँ 16 संस्कारों का संक्षिप्त व...
गर्भाधान संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में गर्भाधान — संस्कार प्रथम संस्कार है। यहीं से बालक का निर्माण होता है। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के पश्चात् दम्पति - युगल को पुत्र उत्पन्न करने के लिए मान्यता दी गयी है। इसलिये शास्त्र में कहा गया है कि - उत्तम संतान प्राप्त करने के लिए सबसे पहले गर्भाधान - संस्कार करना होता है। पितृ - ऋण उऋण होने के लिए ही संतान - उत्पादनार्थ यह संस्कार किया जाता है। इस संस्कार से बीज तथा गर्भ से सम्बन्धित मलिनता आदि दोष दूर ...
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