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संस्कार

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                 जिस क्रिया से शरीर, मन और आत्मा उत्तम हो उसको संस्कार कहते हैं। संस्कार किसी वस्तु के पुराने स्वरूप को बदलकर उसे नया स्वरूप दे देता है। जैसे सुनार अशुद्ध सोने को अग्नि में तपाकर उसे शुद्ध बना देता है, वैसे ही वैदिक संस्कृति में उत्पन्न होने वाले बालक को संस्कारों की भट्टी में डालकर उसके दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुणों को डालने का प्रयास किया जाता है, इसी प्रयत्न को संस्कार कहते हैं।           चरक ऋषि ने कहा है - 'संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते' अर्थात् पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उनकी जगह  सद्गुणों का आधान करने को संस्कार कहते है। बालक का जब जन्म होता है तब वह दो प्रकार के संस्कार अपने साथ लेकर आता है, एक प्रकार के संस्कार वे हैं, जिन्हें वह जन्म-जन्मांतरों से अपने साथ लाता है, दूसरे प्रकार के संस्कार वे हैं, जिन्हें वह अपने माता-पिता के संस्कारों के रूप में वंश परम्परा से प्राप्त करता है। ये अच्छे भी हो सकते हैं, बुरे भी हो सकते हैं। संस्कारों द्वारा मानव के नव निर...