संस्कार
जिस क्रिया से शरीर, मन और आत्मा उत्तम हो उसको संस्कार कहते हैं। संस्कार किसी वस्तु के पुराने स्वरूप को बदलकर उसे नया स्वरूप दे देता है। जैसे सुनार अशुद्ध सोने को अग्नि में तपाकर उसे शुद्ध बना देता है, वैसे ही वैदिक संस्कृति में उत्पन्न होने वाले बालक को संस्कारों की भट्टी में डालकर उसके दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुणों को डालने का प्रयास किया जाता है, इसी प्रयत्न को संस्कार कहते हैं।
चरक ऋषि ने कहा है - 'संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते' अर्थात् पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उनकी जगह सद्गुणों का आधान करने को संस्कार कहते है। बालक का जब जन्म होता है तब वह दो प्रकार के संस्कार अपने साथ लेकर आता है, एक प्रकार के संस्कार वे हैं, जिन्हें वह जन्म-जन्मांतरों से अपने साथ लाता है, दूसरे प्रकार के संस्कार वे हैं, जिन्हें वह अपने माता-पिता के संस्कारों के रूप में वंश परम्परा से प्राप्त करता है। ये अच्छे भी हो सकते हैं, बुरे भी हो सकते हैं। संस्कारों द्वारा मानव के नव निर्माण की योजना वह योजना है, जिसमें बालक को ऐसे वातावरण से घेर दिया जाए, जिसमें अच्छे संस्कारों को पनपने का अवसर प्राप्त हो और बुरे संस्कारों को वे चाहे पिछले जन्मों के हों, चाहे माता-पिता से प्राप्त हुए हों, चाहे इस जन्म में पड़ने वाले हों। उन्हें निर्बीज कर दिया जाए। हमारी अन्य योजनाएँ भौतिक योजनाएँ होती हैं, पर संस्कारों की योजना आध्यात्मिक योजना है। वैदिक संस्कृति का मूल उद्देश्य उस मानव का आध्यात्मिक निर्माण करना है जिसके लिए बांध बांधे जाते हैं, नहरें खोदी जाती है।
जो देश उन्नति करने लगता है, वह योजनाओं का तांता सा बांध देता है, कोई पंचवर्षीय योजनाएं बनाता है, कोई दस वर्षीय। परन्तु क्योंकि हमारी दृष्टि आधिभौतिक जगत तक सीमित है, इसलिए हमारी योजनाओं का उद्देश्य बांध बांधना, नहरें खोदना, सड़के बनाना तथा रेलें बिछा देना मात्र रह जाता है। हम भौतिकवादी दृष्टिकोण के कारण समझ बैठे हैं कि मानव का सबसे बड़ा प्रश्न रोटी का प्रश्न है। रोटी का प्रश्न हल हो गया, तो दुनिया के सब प्रश्न हल हो गए। बांधों-नहरों से उत्पादन बढ़ गया, तो दूसरी कोई समस्या नहीं रही। भौतिकवादी समझ में मानव भूख-प्यास का पुतला है, इसके सिवाय कुछ नहीं। वैदिक विचारधारा मानव को शरीर मात्र नहीं मानती। इसमें संदेह नहीं कि बांध बांधने, नहरें खोदने, सड़के बनाने तथा रेलें बिछाने की योजनाएं भी चलनी चाहिए। परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से ये योजनाएं अत्यंत प्रारंभिक योजनाएं हैं, मानव के नव निर्माण की वैदिक दृष्टि से आधारभूत योजना का श्रीगणेश भी नहीं।
वैदिक संस्कृत की वास्तविक योजना, वह योजना जिसके लिए इस संस्कृति ने जन्म लिया, संस्कारों द्वारा मानव का नव निर्माण करना है। हम बांध बांधते हैं, नहरें खोदते हैं, सड़कें बनाते तथा रेलें बिछाते हैं। परन्तु वह मानव जिसके लिए यह सब कुछ करते हैं, वह कहाँ है ? उसके लिए हमने पंचवर्षीय या दसवर्षीय कौन सी योजना बनाई है
? रेलों का तांता बिछ जाए, मोटरें घर-घर पहुंच जाएं, जमीन के चप्पे-चप्पे पर पानी चला जाए, उत्पादन असीम हो जाए, परन्तु इन सब का उपयोग करने वाला मानव अगर सच्चा न हो, ईमानदार न हो, दूसरों के दुःख में दुःखी और सुख में सुखी होने वाला न हो, दुराचारी हो, भ्रष्टाचारी हो, व्यभिचारी हो, तो ये रेल-मोटर, ये नहरें और ये बांध किस काम आएंगे? और क्या, ऐसा हो नहीं रहा ? क्या चारों तरफ चकाचौंध कर देने वाले वैभव की बढती के साथ-साथ उस मानव का जिसके लिए यह संपूर्ण वैभव खड़ा किया जा रहा है, दिनों-दिन पतन नहीं हो रहा ? मानव कहाँ है? कहाँ है वह मानव जिसमें मानवीयता हो ? वह मानव जो प्रलोभनों के प्रचण्ड बवण्डर उठ खड़े होने पर उसे तिनकों की तरह परे फेंक दे? वैदिक-संस्कृति की सबसे बड़ी योजना, और उस योजना का केंद्र बिंदु, संस्कारों द्वारा मानव का नव निर्माण है।
वैदिक संस्कृति ने मानव के निर्माण की योजना को तैयार किया था । इसी योजना को सफल बनाने के लिए संस्कारों की पद्धति को प्रचलित किया था । संस्कारों से ही तो मनुष्य बनता है। आत्म-तत्व, जन्म-जन्मांतरों में किस-किस प्रक्रिया में से गुजरा है? हर जन्म में इस पर संस्कार पड़ते हैं, अच्छे या बुरे - यही तो इस जन्म की, पिछले जन्मों की और अगले जन्मों की कहानी है। इस संस्कृति में मनुष्य जन्म का उद्देश्य शुभ संस्कारों द्वारा 'आत्म-तत्व' के मैल को धोना है, उसे निखारते जाना है। पिछला मैल कैसे धोया जाए, और नया रंग कैसे चढ़ाया जाए? यह सब कुछ इस जन्म के संस्कारों द्वारा ही तो हो सकता है। इस जन्म में बंधकर ही तो आत्म-तत्त्व पकड़ में आता है। बर्तन हाथ से पकड़कर मंजता है, आत्मा का शरीर में बंधकर मैल धुलता है, मानव शरीर में बंधकर ही उस पर शुभ संस्कारों का नया रंग चढ़ता है। जिस समय जिस क्षण आत्मा मानव शरीर के बंधन में पड़ा उसी समय से उसी क्षण से वैदिक संस्कृति उस पर उत्तम संस्कार डालना शुरू कर देती है, और उस क्षण तक डालती चली जाती है जब तक आत्म-तत्त्व शरीर को छोड़कर फिर तिरोहित नहीं हो जाता।
आत्मा जब-जब शरीर में आता है, तब-तब वैदिक संस्कृति की व्यवस्था में संस्कारों की श्रृंखला से उसे ऐसा घेर दिया जाता है, जिससे उस पर कोई अशुभ संस्कार पड़ने ही नहीं पाता । संस्कार तो पड़ने ही हैं, कोई व्यवस्था नहीं होगी तो अच्छों के स्थान में बुरे संस्कार ज्यादा पड़ते जाएंगे, मानव का निर्माण होने के स्थान में मानव का बिगाड़ होता चला जाएगा। व्यवस्था होगी तो संस्कारों का नियमन होगा, अच्छे संस्कार पड़ें, बुरे न पड़ें, इस बात का नियंत्रण होगा तो मनुष्य लगातार मनुष्य बनता जाएगा, स्वयं उठता जाएगा, समाज को उठाता जाएगा। वैदिक संस्कृति की जो विचारधारा है उसके अनुसार यह जन्म, पिछले जन्म व अगले जन्म यह सब संस्कारों द्वारा आत्म-शोधन का सिलसिला हैं, संस्कारों की लगातार चोट से आत्म-तत्त्व पर पड़े मैल को धो डालने का प्रयत्न है।
वैदिक संस्कृति में मनुष्य को बिल्कुल बदल देने, उसमें आमूलचूल परिवर्तन करने का जो प्रयास किया जाता है, उसमें दो-चार नहीं सोलह संस्कार हैं। इन संस्कारों का क्रम से नाम निम्न प्रकार है।
1- गर्भाधान संस्कार
2- पुंसवन संस्कार
3- सीमन्तोनयन संस्कार
4- जातकर्म संस्कार
5- नामकरण संस्कार
6- निष्क्रमण संस्कार
7- अन्नप्राशन संस्कार
8- चूड़ाकर्म संस्कार
9- कर्णवेध संस्कार
10- उपनयन संस्कार
11- वेदारम्भ संस्कार
12- समावर्तन संस्कार
13- विवाह संस्कार
14- वानप्रस्थ संस्कार
15- संन्यास संस्कार
16- अन्त्येष्टि संस्कार
यज्ञ, हवन, 16 संस्कार(गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोनयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, संन्यास और अन्त्येष्टि संस्कार) जन्मदिन, पुण्यतिथि, गृह-प्रवेश, वास्तु शान्ति, स्वस्ति-यज्ञ, शान्ति-यज्ञ, पंच महा यज्ञ, चतुर्वेद परायण पाठ, चतुर्वेद परायण महायज्ञ, रूद्र महायज्ञ, गायत्री जप, महामृत्युंजय जप, अनुष्ठान, गायत्री यज्ञ, ओ३म् संकीर्तन, आयुष्काम यज्ञ,आदि के लिए सम्पर्क करे।
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गया, बिहार
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